भगवद्गीता
कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया कृष्ण का उपदेश — कर्तव्य, आत्मा और भक्ति पर हिंदू दर्शन का मूल ग्रंथ, 18 अध्यायों और लगभग 700 श्लोकों में।
भगवद्गीता किसने लिखी
परंपरा गीता की रचना का श्रेय महर्षि वेदव्यास (कृष्ण द्वैपायन) को देती है, जिन्होंने महाभारत की रचना की। मूल रूप से गीता कोई अलग ग्रंथ नहीं, बल्कि उसी महाकाव्य का अंश है: यह भीष्म पर्व में है — प्रचलित संस्करणों में अध्याय 25–42 (पुणे के आलोचनात्मक संस्करण में 23–40)। वेदव्यास लेखकों में इस दृष्टि से अनोखे हैं कि वे अपनी ही कथा के एक पात्र भी हैं — पाण्डवों और कौरवों, दोनों के पितामह। वेदव्यास पर पूरा पृष्ठ पढ़ें →
किसने कहा, और सबसे पहले किसने सुना
यह उपदेश श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया — श्रीकृष्ण रथ हाँक रहे थे, अर्जुन योद्धा थे। पर गीता एक वृत्तांत के रूप में कही गई है: हस्तिनापुर में बैठे अंधे राजा धृतराष्ट्र इसे अपने मंत्री संजय से सुनते हैं, जिन्हें वेदव्यास ने दिव्य दृष्टि दी थी ताकि वे युद्धभूमि की हर बात देख-सुन सकें। अंत में (18.75) संजय स्वयं कहते हैं कि व्यासजी की कृपा से ही उन्होंने यह परम गोपनीय योग सीधे श्रीकृष्ण से सुना। अतः जिस दिन यह कहा गया, उस दिन श्रीकृष्ण वक्ता थे, और इसे अर्जुन, संजय और संजय के माध्यम से धृतराष्ट्र ने सुना।
"सबसे पहले किसने सुना" — इसका एक बहुत प्राचीन उत्तर गीता स्वयं देती है। चौथे अध्याय (4.1–3) में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यह अविनाशी योग उन्होंने सबसे पहले विवस्वान (सूर्यदेव) को सिखाया था, विवस्वान ने मनु को, और मनु ने राजा इक्ष्वाकु को; राजर्षियों की परंपरा से यह आगे बढ़ा, पर बहुत समय बीतने पर लुप्त हो गया — और वही पुरातन योग श्रीकृष्ण आज अर्जुन को बता रहे हैं, क्योंकि वह उनका भक्त और सखा है।
यह कहाँ कहा गया
हरियाणा स्थित कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर — वही "धर्मक्षेत्र" जिससे गीता का पहला श्लोक आरंभ होता है। युद्ध के लिए खड़ी दोनों सेनाओं के बीच, अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण ने रथ खड़ा किया (1.21–24), और पूरा संवाद वहीं हुआ। कुरुक्षेत्र नगर के पास ज्योतिसर को परंपरा से वही स्थान माना जाता है, और वहाँ का प्राचीन वटवृक्ष इस उपदेश का साक्षी मानकर पूजा जाता है।
यह कब कहा गया
कथा के अनुसार गीता अठारह दिन के कुरुक्षेत्र युद्ध के पहले दिन की लड़ाई आरंभ होने से ठीक पहले कही गई, जब शंख बज चुके थे और शस्त्र उठने ही वाले थे (1.20)। परंपरा के अनुसार वह दिन मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी (मोक्षदा एकादशी) था — इसीलिए हर वर्ष इसी तिथि को, प्रायः नवंबर या दिसंबर में, गीता जयंती मनाई जाती है। पारंपरिक गणना युद्ध को द्वापर युग के अंत में, लगभग 3100 ईसा पूर्व रखती है; जबकि अधिकांश आधुनिक विद्वान ग्रंथ के वर्तमान रूप की रचना को ईसा पूर्व की अंतिम कुछ शताब्दियों में मानते हैं।
यह क्यों कहा गया — इसका उद्देश्य
गीता इसलिए है क्योंकि एक महान योद्धा टूट गया। पहले अध्याय में अर्जुन विपक्षी सेना में अपने पितामह, गुरुओं और भाइयों को देखकर धनुष रख देते हैं और लड़ने से मना कर देते हैं। श्रीकृष्ण के सत्रह अध्यायों का उत्तर केवल "क्या मुझे लड़ना चाहिए?" का नहीं, उसके पीछे छिपे गहरे प्रश्नों का भी है: आत्मा क्या है, और क्या वह मरती है? फल से बँधे बिना संसार में कर्म कैसे करें? अपना स्वधर्म क्या है और वह क्यों महत्वपूर्ण है? ईश्वर को कैसे जानें, प्रेम करें और उनकी शरण कैसे लें? इस क्रम में गीता कर्मयोग (निष्काम कर्म), ज्ञानयोग और भक्तियोग के मार्ग बताती है, और श्रीकृष्ण के इस आह्वान पर पूर्ण होती है कि सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ (18.66)। इसका उद्देश्य अर्जुन के अपने शब्दों में पूरा होता है (18.73): "मेरा मोह नष्ट हो गया, मुझे स्मृति प्राप्त हो गई… मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।"
इसकी संरचना
गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, जो लगभग सभी अनुष्टुप छंद में हैं। प्रचलित गणना के अनुसार श्रीकृष्ण 574 श्लोक बोलते हैं, अर्जुन 84, संजय 41, और धृतराष्ट्र केवल एक — आरंभिक प्रश्न। हर अध्याय को "योग" कहा गया है — जैसे पहला अध्याय अर्जुनविषादयोग है, अर्थात अर्जुन के विषाद का योग। नीचे पहले दस अध्याय — अर्जुन के विषाद से लेकर कर्मयोग, ध्यान और भक्ति होते हुए श्रीकृष्ण की दिव्य विभूतियों तक — पूर्ण रूप से उपलब्ध हैं, संस्कृत, लिप्यंतरण, अंग्रेज़ी अनुवाद, हिंदी अर्थ और भावार्थ सहित, साथ ही आगे के अध्यायों के प्रमुख श्लोक भी।