सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥
sarva-bhūta-sthitaṁ yo māṁ bhajatyekatvam āsthitaḥ sarvathā vartamāno ’pi sa yogī mayi vartate
हिंदी अर्थ
जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सब प्राणियों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानंदघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है।
भावार्थ
"सर्वथा वर्तमानोऽपि" — चाहे जिस प्रकार भी रहता हो। ऐसे भक्त को गुफा में रहने की आवश्यकता नहीं; काम करते, परिवार पालते या युद्ध लड़ते हुए भी वह ईश्वर में रहता है, क्योंकि वह हर मिलने वाले में ईश्वर की उपासना करता है।