यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ tyajatyante kalevaram taṁ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ
हिंदी अर्थ
हे कौन्तेय! मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, वह उसी-उसी को प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है।
भावार्थ
मुख्य वाक्यांश है "सदा तद्भावभावितः" — सदा उसी भाव में डूबा हुआ। हमारा अंतिम विचार आकस्मिक नहीं; वह जीवन भर जिसके बारे में सबसे अधिक सोचा, उसका स्वाभाविक परिणाम है। राजा भरत की प्रसिद्ध कथा, जो हिरण का चिंतन करते हुए मरने से हिरण बनकर जन्मे, इसी का उदाहरण है।