Bhakti ArohanBhakti Arohan

भगवद्गीता — अध्याय 8, श्लोक 5

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥

anta-kāle cha mām eva smaran muktvā kalevaram yaḥ prayāti sa mad-bhāvaṁ yāti nāstyatra sanśhayaḥ

हिंदी अर्थ

जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर त्यागकर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है — इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

भावार्थ

एक अत्यंत सांत्वनादायक वचन, और मरणासन्न व्यक्ति के पास भगवान का नाम जपने की हिंदू परंपरा का आधार। अंतिम क्षण में हम मन में जो धारण करते हैं, वही तय करता है कि हम कहाँ जाते हैं।

भगवद्गीता अध्याय 8.5 | Bhakti Arohan