तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥
tasmāt tvam indriyāṇyādau niyamya bharatarṣhabha pāpmānaṁ prajahi hyenaṁ jñāna-vijñāna-nāśhanam
हिंदी अर्थ
इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! तुम पहले इंद्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस महापापी काम को निश्चय ही बलपूर्वक मार डालो।
भावार्थ
व्यावहारिक क्रम: इंद्रियों से आरंभ करो, जो सबसे बाहरी मोर्चा है जहाँ से कामना पहले प्रवेश करती है। ज्ञान (समझ) और विज्ञान (अनुभूत अनुभव) — दोनों दाँव पर हैं; कामना हमसे वह भी छीन सकती है जो हम समझते हैं और वह भी जो हमने अनुभव किया है।