न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
na prahṛiṣhyet priyaṁ prāpya nodvijet prāpya chāpriyam sthira-buddhir asammūḍho brahma-vid brahmaṇi sthitaḥ
हिंदी अर्थ
जो प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिर बुद्धि वाला, संशय-रहित ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्म में स्थित है।
भावार्थ
यह दूसरे अध्याय के स्थितप्रज्ञ के चित्र को नए शब्दों में दोहराता है। ब्रह्मज्ञानी दावों या वेश से नहीं, बल्कि प्रिय और अप्रिय अनुभवों में स्थिरता से पहचाना जाता है।