लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥
labhante brahma-nirvāṇam ṛiṣhayaḥ kṣhīṇa-kalmaṣhāḥ chhinna-dvaidhā yatātmānaḥ sarva-bhūta-hite ratāḥ
हिंदी अर्थ
जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके संशय ज्ञान द्वारा कट गए हैं, जो संयमी हैं और सब प्राणियों के हित में रत हैं, वे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
"सर्वभूतहिते रताः" — सब प्राणियों के हित में रत। गीता में मुक्ति स्वार्थी पलायन नहीं। आत्मज्ञानी ऋषि सक्रिय रूप से दूसरों के कल्याण में लगा रहता है; करुणा ज्ञान का लक्षण है, उससे विचलन नहीं।