सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥
sarva-yoniṣhu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ tāsāṁ brahma mahad yonir ahaṁ bīja-pradaḥ pitā
हिंदी अर्थ
हे कौन्तेय! सब योनियों में जितनी भी मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि महत् ब्रह्म (प्रकृति) है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।
भावार्थ
यह श्लोक इस विचार का आधार है कि हर जीव, मनुष्य हो या पशु, एक ही पिता की संतान है। यह 5.18 और 6.29 में गीता की समदर्शिता की शिक्षा का सशक्त आधार है। प्रकृति सब शरीरों की माता है; ईश्वर सब आत्माओं के पिता हैं।
