सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥
sattvaṁ rajas tama iti guṇāḥ prakṛiti-sambhavāḥ nibadhnanti mahā-bāho dehe dehinam avyayam
हिंदी अर्थ
हे महाबाहो! सत्त्व, रज और तम, ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी देही (आत्मा) को देह में बाँधते हैं।
भावार्थ
इस अध्याय में पहली बार तीनों गुणों के नाम आते हैं। "गुण" का अर्थ "विशेषता" है, पर "धागा" या "रस्सी" भी। यह श्लेष जान-बूझकर है: प्रकृति के गुण ही वे रस्सियाँ हैं जो आत्मा को बाँधती हैं। आत्मा "अव्यय" (अविनाशी) है; बंधन वास्तविक है, पर स्थायी नहीं।
