अर्जुन उवाच । अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥
arjuna uvācha atha kena prayukto ’yaṁ pāpaṁ charati pūruṣhaḥ anichchhann api vārṣhṇeya balād iva niyojitaḥ
हिंदी अर्थ
अर्जुन बोले: हे वार्ष्णेय! तो फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी बलपूर्वक लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?
भावार्थ
अर्जुन वह प्रश्न पूछते हैं जो हर किसी ने कभी पूछा है: मैं वे काम क्यों करता हूँ जिन्हें मैं गलत जानता हूँ, मानो विवश होकर? यह दिखाता है कि वे अब केवल अपने पक्ष का बचाव नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से शिक्षा से जुड़ रहे हैं।