अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥
akṣharāṇām a-kāro ’smi dvandvaḥ sāmāsikasya cha aham evākṣhayaḥ kālo dhātāhaṁ viśhvato-mukhaḥ
हिंदी अर्थ
मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षय काल अर्थात् काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुख वाला, विराट स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ।
भावार्थ
"अ" पहला अक्षर है और संस्कृत में हर व्यंजन में अंतर्निहित स्वर के रूप में उपस्थित है — इसी प्रकार ईश्वर सारी वाणी में उपस्थित हैं। द्वंद्व समास शब्दों को समान रूप से जोड़ता है, जो शायद ईश्वर की समदृष्टि को दर्शाता है।