अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥ ४१ ॥
adharmābhibhavāt kṛiṣhṇa praduṣhyanti kula-striyaḥ strīṣhu duṣhṭāsu vārṣhṇeya jāyate varṇa-saṅkaraḥ
हिंदी अर्थ
हे कृष्ण! अधर्म के बढ़ने पर कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं; और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
भावार्थ
यह और आगे के श्लोक महाकाव्य के युग की सामाजिक चिंताओं को दर्शाते हैं, जहाँ वंश और कुल-संस्कार समाज को जोड़े रखने वाले माने जाते थे, और जिस युद्ध में अधिकांश पुरुष मारे जाएँ, वह परिवारों को संरक्षण और व्यवस्था से वंचित कर देता। ये अर्जुन के तर्क हैं, जो उन्होंने विषाद में कहे — श्रीकृष्ण इनका समर्थन नहीं करते, और दूसरे अध्याय में वे इस पूरी विचारधारा को अर्जुन के अयोग्य दुर्बलता कहते हैं।