कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥
karma-jaṁ buddhi-yuktā hi phalaṁ tyaktvā manīṣhiṇaḥ janma-bandha-vinirmuktāḥ padaṁ gachchhanty-anāmayam
हिंदी अर्थ
बुद्धियुक्त ज्ञानी पुरुष कर्म से उत्पन्न फल को त्यागकर जन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और दुख-रहित परम पद को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
यहाँ श्रीकृष्ण कर्मयोग का अंतिम लक्ष्य बताते हैं: "अनामय पद" — सब क्लेशों से मुक्त अवस्था। उल्लेखनीय है कि यह संसार छोड़कर नहीं, बल्कि संसार में पूरी तरह जीते हुए कर्म के प्रति अपना संबंध बदलकर प्राप्त होती है।