यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥
yadā te moha-kalilaṁ buddhir vyatitariṣhyati tadā gantāsi nirvedaṁ śhrotavyasya śhrutasya cha
हिंदी अर्थ
जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य (भोगों) से विरक्त हो जाओगे।
भावार्थ
"मोहकलिल" — मोह का दलदल — एक प्रभावशाली चित्र है: भ्रम चिपचिपा होता है, और हर संघर्ष और गहरा खींचता लगता है। इसके पार पहुँचने पर इस लोक और परलोक के सुखों के अनंत वचनों ("जो सुना गया") का आकर्षण समाप्त हो जाता है।