श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥
śhruti-vipratipannā te yadā sthāsyati niśhchalā samādhāv-achalā buddhis tadā yogam avāpsyasi
हिंदी अर्थ
जब अनेक प्रकार के शास्त्र-वचनों से विचलित तुम्हारी बुद्धि समाधि में निश्चल और अचल होकर ठहर जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त करोगे।
भावार्थ
अर्जुन का भ्रम आंशिक रूप से कर्तव्य के विषय में विरोधी शिक्षाओं से आरंभ हुआ था। श्रीकृष्ण कहते हैं कि उत्तर अधिक जानकारी नहीं, बल्कि समाधि — गहन तल्लीनता — में स्थिर मन है। उसी स्थिरता से उचित कर्म स्पष्ट हो जाता है।