अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥
ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te
हिंदी अर्थ
क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ; परंतु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसीसे गिरते हैं अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
क्योंकि वे अपनी उपासना के पीछे के एक ईश्वर को नहीं पहचानते, उनका फल सीमित रहता है और वे पुनर्जन्म में लौटते हैं। किसकी उपासना कर रहे हैं, यह जानना उपासना के गंतव्य को बदल देता है।