येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
ye ’pyanya-devatā-bhaktā yajante śhraddhayānvitāḥ te ’pi mām eva kaunteya yajantyavidhi-pūrvakam
हिंदी अर्थ
हे कौन्तेय! जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को श्रद्धा से युक्त होकर पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं; किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है।
भावार्थ
एक उदार और समावेशी श्लोक: हर सच्ची उपासना अंततः उसी एक ईश्वर तक पहुँचती है। श्रीकृष्ण केवल इतना कहते हैं कि यह "अविधिपूर्वकम्" है — इस पूर्ण समझ के बिना कि वे वास्तव में किसकी उपासना कर रहे हैं।