वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ १० ॥
vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśhritāḥ bahavo jñāna-tapasā pūtā mad-bhāvam āgatāḥ
हिंदी अर्थ
राग, भय और क्रोध से रहित, मुझमें तन्मय और मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से लोग ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
भावार्थ
श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि यह मार्ग सिद्ध है — "बहुत से" लोग इस पर चल चुके हैं। 2.56 में बताए गए वही तीन भाव फिर आते हैं: राग, भय और क्रोध। ईश्वर की शरण लेने से ये मिट जाते हैं।