अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥
avyaktaṁ vyaktim āpannaṁ manyante mām abuddhayaḥ paraṁ bhāvam ajānanto mamāvyayam anuttamam
हिंदी अर्थ
बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी परम भाव को न जानते हुए, मुझ अव्यक्त को मनुष्य की भाँति जन्म लेकर व्यक्ति-भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं।
भावार्थ
श्रीकृष्ण को केवल एक मनुष्य मानना जो प्रसिद्ध हो गया — या एक निराकार सत्ता जिसने अस्थायी शरीर धारण किया — उनके वास्तविक स्वरूप से चूकना है। गीता उनके दिव्य स्वरूप को स्वयं शाश्वत और परम बताती है।