यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥
yaj jñātvā na punar moham evaṁ yāsyasi pāṇḍava yena bhūtānyaśheṣheṇa drakṣhyasyātmanyatho mayi
हिंदी अर्थ
हे पाण्डव! जिसे जानकर तुम फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगे, और जिस ज्ञान से तुम सब प्राणियों को अपने में और फिर मुझ परमात्मा में देखोगे।
भावार्थ
सच्चे ज्ञान का फल: अर्जुन का वर्तमान मोह फिर नहीं लौटेगा। वे सब प्राणियों को — उन संबंधियों सहित जिनके लिए वे शोक कर रहे हैं — एक ही आत्मा में और ईश्वर में देखेंगे। अलगाव, जो उनके शोक की जड़ है, मिट जाता है।