पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४ ॥
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśho ’pi saḥ jijñāsur api yogasya śhabda-brahmātivartate
हिंदी अर्थ
वह श्रीमानों के घर जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है; तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है।
भावार्थ
पिछला अभ्यास गति की तरह काम करता है — वह व्यक्ति को "विवश होने पर भी" (अवशः) आगे खींचता है। और योग को जानने की सच्ची इच्छा भी व्यक्ति को केवल कर्मकांडी धर्म (शब्दब्रह्म) से ऊपर उठा देती है।