तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥
tatra taṁ buddhi-sanyogaṁ labhate paurva-dehikam yatate cha tato bhūyaḥ sansiddhau kuru-nandana
हिंदी अर्थ
वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किए हुए बुद्धि-संयोग को, अर्थात् समबुद्धि रूप योग के संस्कारों को, अनायास ही प्राप्त हो जाता है; और हे कुरुनंदन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्ति रूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है।
भावार्थ
कुछ भी नहीं खोता: पिछले जन्म में विकसित समझ फिर उभर आती है। इसका प्रयोग प्रायः यह समझाने के लिए किया जाता है कि कुछ लोग बचपन से ही आध्यात्मिक जीवन की ओर स्वाभाविक आकर्षण क्यों अनुभव करते हैं।