देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati
हिंदी अर्थ
जैसे देहधारी आत्मा इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापे को प्राप्त होती है, वैसे ही वह दूसरे शरीर को प्राप्त होती है। धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।
भावार्थ
एक सरल, पर प्रभावशाली उपमा। जो बालक आप कभी थे, वह नहीं रहा — उस शरीर की कोई कोशिका शेष नहीं — फिर भी आप मरे नहीं; "आप" बने रहे। श्रीकृष्ण अर्जुन से मृत्यु को इसी प्रकार का एक और परिवर्तन मानने को कहते हैं। धीर पुरुष यह समझ चुके हैं और इससे विचलित नहीं होते।