सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ २५ ॥
saktāḥ karmaṇyavidvānso yathā kurvanti bhārata kuryād vidvāns tathāsaktaśh chikīrṣhur loka-saṅgraham
हिंदी अर्थ
हे भारत! कर्म में आसक्त अज्ञानी जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्ति-रहित ज्ञानी को भी लोकसंग्रह (संसार के मार्गदर्शन) की इच्छा से वैसे ही कर्म करना चाहिए।
भावार्थ
"लोकसंग्रह" — संसार को जोड़े रखना, लोगों को उचित मार्ग दिखाना — गीता के प्रमुख आदर्शों में से है। ज्ञानी भी किसी और जितनी ही लगन से कर्म करते हैं; अंतर उद्देश्य का है। वे व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, दूसरों के कल्याण के लिए कर्म करते हैं।