नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥
naiva tasya kṛitenārtho nākṛiteneha kaśhchana na chāsya sarva-bhūteṣhu kaśhchid artha-vyapāśhrayaḥ
हिंदी अर्थ
उस महापुरुष का इस लोक में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन है और न कर्म न करने से, और न ही सब प्राणियों में उसका किसी से कोई स्वार्थ का संबंध रहता है।
भावार्थ
आत्मज्ञानी पूर्णतः स्वतंत्र है — न कर्म के लिए विवश, न कर्म न करने से भयभीत, और किसी का अपने स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं करता। यही आंतरिक स्वतंत्रता कर्मयोग का लक्ष्य है, उसे छोड़ने का कारण नहीं।