बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥
buddhir jñānam asammohaḥ kṣhamā satyaṁ damaḥ śhamaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ bhavo ’bhāvo bhayaṁ chābhayameva cha
हिंदी अर्थ
निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह, सुख-दुख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा —
भावार्थ
श्लोक 4–5 प्राणियों के अनेक गुणों और अवस्थाओं को गिनाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये सब उन्हीं से आते हैं — केवल सुखद ही नहीं, दुख, मृत्यु और भय भी। जीवन में कुछ भी ईश्वर के क्षेत्र से बाहर नहीं।