Bhakti ArohanBhakti Arohan

भगवद्गीता — अध्याय 10, श्लोक 5

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥

ahinsā samatā tuṣhṭis tapo dānaṁ yaśho ’yaśhaḥ bhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛithag-vidhāḥ

हिंदी अर्थ

— अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति — ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं।

भावार्थ

अहिंसा, समता, तुष्टि (संतोष) — गीता के अनेक प्रमुख गुण यहाँ आते हैं, जिनका स्रोत ईश्वर हैं।

भगवद्गीता अध्याय 10.5 | Bhakti Arohan