श्रीभगवानुवाच । प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥
śhrī bhagavān uvācha prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha mano-gatān ātmany-evātmanā tuṣhṭaḥ sthita-prajñas tadochyate
हिंदी अर्थ
श्रीभगवान बोले: हे पार्थ! जब मनुष्य मन में उठने वाली सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
भावार्थ
पहला और केंद्रीय लक्षण: भीतर से संतोष। "आत्मन्येवात्मना तुष्टः" — आत्मा से, आत्मा में ही संतुष्ट। ऐसा व्यक्ति बलपूर्वक इच्छाओं को दबा नहीं रहा; उसे पूर्ण अनुभव करने के लिए बाहरी वस्तुओं की आवश्यकता ही नहीं रही।