दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥
duḥkheṣhv-anudvigna-manāḥ sukheṣhu vigata-spṛihaḥ vīta-rāga-bhaya-krodhaḥ sthita-dhīr munir uchyate
हिंदी अर्थ
जिसका मन दुखों में उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी लालसा नहीं रहती, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है — वह मुनि स्थितबुद्धि कहलाता है।
भावार्थ
श्रीकृष्ण तीन भावों का नाम लेते हैं जिनसे स्थिर मुनि मुक्त होता है: राग (आसक्ति), भय और क्रोध। ये आपस में जुड़े हैं — जिससे हम आसक्त हैं उसके खोने का भय होता है, और उस पर संकट आने पर क्रोध। आसक्ति हटा दें, तो बाकी दोनों का ईंधन समाप्त हो जाता है।