उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
utkrāmantaṁ sthitaṁ vāpi bhuñjānaṁ vā guṇānvitam vimūḍhā nānupaśhyanti paśhyanti jñāna-chakṣhuṣhaḥ
हिंदी अर्थ
शरीर छोड़ते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए, अथवा गुणों से युक्त होकर विषयों को भोगते हुए भी, मूढ़ लोग इसे नहीं देखते; ज्ञान-नेत्र वाले ही इसे देखते हैं।
भावार्थ
आत्मा जीवन के हर क्षण में उपस्थित है (आना, रहना, अनुभव करना, जाना), फिर भी अधिकांश लोग उसे कभी देख नहीं पाते। "ज्ञानचक्षु" (ज्ञान का नेत्र) 13.34 में भी आया था। आत्मा को देखना तेज़ आँखों की नहीं, स्पष्ट समझ की बात है।
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