वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥
vedeṣhu yajñeṣhu tapaḥsu chaiva dāneṣhu yat puṇya-phalaṁ pradiṣhṭam atyeti tat sarvam idaṁ viditvā yogī paraṁ sthānam upaiti chādyam
हिंदी अर्थ
योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में, यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्य फल कहा है, उन सबका निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है।
भावार्थ
अध्याय इस ज्ञान को सभी कर्मकांडीय पुण्य से ऊपर रखकर समाप्त होता है। अध्ययन, यज्ञ, तप और दान अच्छे हैं, पर ईश्वर को जानना और प्रेम करना इन सबसे बढ़कर है और "आद्यं स्थानम्" — मूल, शाश्वत धाम — तक ले जाता है।