देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
devān bhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ parasparaṁ bhāvayantaḥ śhreyaḥ param avāpsyatha
हिंदी अर्थ
इस यज्ञ से तुम देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम्हें उन्नत करें; इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त होगे।
भावार्थ
"परस्परं भावयन्तः" — एक-दूसरे को उन्नत करते हुए — एक पारिस्थितिक और सामाजिक दृष्टि है: मनुष्य, प्रकृति और दैवी शक्तियाँ एक-दूसरे का पोषण करती हैं। अनेक आधुनिक पाठक इसमें प्रकृति के साथ परस्परता की प्राचीन नैतिकता देखते हैं।