इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥
iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥ tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ
हिंदी अर्थ
यज्ञ से प्रसन्न हुए देवता तुम्हें इच्छित भोग देंगे। परंतु जो उनके दिए हुए भोगों को उन्हें अर्पित किए बिना स्वयं भोगता है, वह चोर ही है।
भावार्थ
एक कठोर शब्द: "स्तेन" — चोर। जो संसार से लेता है — अन्न, वायु, जल, दूसरों का श्रम — और बदले में कुछ नहीं देता, वह चुराई हुई वस्तुओं पर जी रहा है। कृतज्ञता और योगदान वैकल्पिक नहीं, धर्म का अंग हैं।