प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥
pralapan visṛijan gṛihṇann unmiṣhan nimiṣhann api indriyāṇīndriyārtheṣhu vartanta iti dhārayan
हिंदी अर्थ
— बोलता, त्यागता, ग्रहण करता, आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी यह समझता है कि इंद्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।
भावार्थ
पलक झपकना भी इसमें शामिल है। साधना यह है कि सब कुछ के बीच याद रखें कि "मैं" शरीर की क्रियाओं से अधिक हूँ। इससे कर्म पर अहंकार की पकड़ ढीली पड़ती है।