नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥ ८ ॥
naiva kiñchit karomīti yukto manyeta tattva-vit paśhyañ śhṛiṇvan spṛiśhañjighrann aśhnangachchhan svapañśhvasan
हिंदी अर्थ
तत्त्व को जानने वाला योगी देखता, सुनता, स्पर्श करता, सूँघता, खाता, चलता, सोता और साँस लेता हुआ भी यही माने कि "मैं कुछ भी नहीं करता" —
भावार्थ
श्लोक 8–9 दैनिक जीवन की साधारण क्रियाएँ गिनाते हैं। तत्त्वज्ञानी ये सब करता है, फिर भी भीतर यह समझ बनाए रखता है कि आत्मा साक्षी है, कर्ता नहीं — इंद्रियाँ केवल अपना स्वाभाविक काम कर रही हैं।