प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥
praśhāntātmā vigata-bhīr brahmachāri-vrate sthitaḥ manaḥ sanyamya mach-chitto yukta āsīta mat-paraḥ
हिंदी अर्थ
ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित, भय-रहित और भली-भाँति शांत अंतःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्त लगाए और मेरे परायण होकर स्थित हो।
भावार्थ
आंतरिक भाव उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी मुद्रा: शांत, निर्भय, संयमी, और — सबसे महत्वपूर्ण — मन ईश्वर में लगा हुआ ("मच्चित्तः", "मत्परः")। गीता में ध्यान अंततः भक्तिमय है।