युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥
yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā
हिंदी अर्थ
दुखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले, और यथायोग्य सोने-जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
भावार्थ
"युक्त" — संतुलित, उचित — चार बार आता है। आहार, विहार, कर्म और निद्रा — सब अनुपात में। अनेक लोग इसे गीता के सबसे व्यावहारिक श्लोकों में मानते हैं: आध्यात्मिक प्रगति एक व्यवस्थित दिनचर्या से आरंभ होती है।