अर्जुन उवाच । ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥
arjuna uvācha jyāyasī chet karmaṇas te matā buddhir janārdana tat kiṁ karmaṇi ghore māṁ niyojayasi keśhava
हिंदी अर्थ
अर्जुन बोले: हे जनार्दन! यदि आप कर्म की अपेक्षा बुद्धि (ज्ञान) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो हे केशव! मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
भावार्थ
अर्जुन ने श्रीकृष्ण को स्थिर बुद्धि की प्रशंसा (2.49) और भीतर संतुष्ट मुनि का वर्णन करते सुना है, और स्वाभाविक निष्कर्ष निकालते हैं: यदि ज्ञान ऊँचा है, तो युद्ध क्यों? तीसरा अध्याय श्रीकृष्ण का उत्तर है — कर्म के पक्ष में तर्क — इसीलिए इसे कर्मयोग कहते हैं।