अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥
anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate
हिंदी अर्थ
जो वाणी किसी को उद्वेग न पहुँचाए, सत्य, प्रिय और हितकारी हो, तथा स्वाध्याय का अभ्यास, यह वाणी-संबंधी तप कहा जाता है।
भावार्थ
यह श्लोक वाणी के लिए एक पूर्ण मार्गदर्शिका है। शब्द "अनुद्वेगकर" (विचलित न करने वाले), "सत्य", "प्रिय" और "हित" (लाभकारी) होने चाहिए। चारों एक साथ: जो सत्य अकारण चोट पहुँचाए, या जो मधुरता असत्य हो, वह तप नहीं। यह मनुस्मृति के कथन की प्रतिध्वनि है: "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयात्।"
