श्रीभगवानुवाच । अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः ॥ ३ ॥
śhrī bhagavān uvācha akṣharaṁ brahma paramaṁ svabhāvo ’dhyātmam uchyate bhūta-bhāvodbhava-karo visargaḥ karma-sanjñitaḥ
हिंदी अर्थ
श्रीभगवान बोले: परम अक्षर (अविनाशी) ब्रह्म है; अपना स्वरूप (जीवात्मा) अध्यात्म कहलाता है; और भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला त्याग (विसर्ग) कर्म कहलाता है।
भावार्थ
श्रीकृष्ण संक्षेप में उत्तर देते हैं। ब्रह्म "अक्षर" है — जो कभी क्षीण नहीं होता। अध्यात्म व्यक्तिगत आत्मा है। यहाँ कर्म का अर्थ वह सृजनात्मक शक्ति (विसर्ग) है जो प्राणियों को अस्तित्व में लाती है।