श्रीभगवानुवाच । त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥
śhrī-bhagavān uvācha tri-vidhā bhavati śhraddhā dehināṁ sā svabhāva-jā sāttvikī rājasī chaiva tāmasī cheti tāṁ śhṛiṇu
हिंदी अर्थ
श्रीभगवान बोले: देहधारियों की स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसके बारे में सुनो।
भावार्थ
कृष्ण का उत्तर ध्यान को इस बात से हटा देता है कि कोई नियमों का पालन करता है या नहीं, और इस पर ले जाता है कि उसकी श्रद्धा किस प्रकार की है। श्रद्धा "स्वभावजा" (स्वभाव से उत्पन्न) है: व्यक्ति की प्रवृत्तियों और अतीत से बनी हुई। हर किसी में कोई न कोई श्रद्धा होती है; प्रश्न उसकी गुणवत्ता का है।
