योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥
yogī yuñjīta satatam ātmānaṁ rahasi sthitaḥ ekākī yata-chittātmā nirāśhīr aparigrahaḥ
हिंदी अर्थ
योगी को चाहिए कि वह एकांत स्थान में अकेला रहकर, मन और शरीर को वश में रखकर, आशा और संग्रह से रहित होकर निरंतर आत्मा को परमात्मा के ध्यान में लगाए।
भावार्थ
यहाँ से ध्यान पर गीता का व्यावहारिक निर्देश आरंभ होता है (श्लोक 10–17)। पहली आवश्यकता एक शांत, विघ्न-रहित स्थान और ऐसा मन है जो इच्छा या संग्रह में व्यस्त न हो।