न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
na karmaṇām anārambhān naiṣhkarmyaṁ puruṣho ’śhnute na cha sannyasanād eva siddhiṁ samadhigachchhati
हिंदी अर्थ
मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ न करने से निष्कर्मता (कर्म-बंधन से मुक्ति) पाता है, और न केवल कर्मों के त्याग से सिद्धि प्राप्त करता है।
भावार्थ
नैष्कर्म्य — कर्म के बंधनकारी प्रभाव से मुक्ति — केवल कुछ न करने से प्राप्त नहीं होती। भीतर के परिवर्तन के बिना बाहरी त्याग खोखला है। यह सीधे अर्जुन की अपने कर्तव्य से हट जाने की इच्छा का उत्तर है।