न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
na hi kaśhchit kṣhaṇam api jātu tiṣhṭhatyakarma-kṛit kāryate hyavaśhaḥ karma sarvaḥ prakṛiti-jair guṇaiḥ
हिंदी अर्थ
कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता; क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा सब विवश होकर कर्म करते हैं।
भावार्थ
साँस लेना, सोचना, खाना — चुपचाप बैठना भी एक प्रकार का कर्म है। चूँकि कर्म से बचा नहीं जा सकता, असली प्रश्न यह नहीं कि कर्म करें या नहीं, बल्कि कैसे करें। यह पूरी चर्चा को पलायन से रूपांतरण की ओर मोड़ देता है।