इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥
ichchhā-dveṣha-samutthena dvandva-mohena bhārata sarva-bhūtāni sammohaṁ sarge yānti parantapa
हिंदी अर्थ
हे भरतवंशी परंतप! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुख आदि द्वंद्व रूप मोह से संपूर्ण प्राणी अत्यंत अज्ञानता को प्राप्त हो रहे हैं।
भावार्थ
संसार ईश्वर को क्यों नहीं जानता? क्योंकि जन्म से ही हम पसंद और नापसंद से इधर-उधर खींचे जाते हैं। वही निरंतर झूला हमारे भ्रम की जड़ है।