वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥
vedāvināśhinaṁ nityaṁ ya enam ajam avyayam kathaṁ sa puruṣhaḥ pārtha kaṁ ghātayati hanti kam
हिंदी अर्थ
हे पार्थ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मरवाता है और कैसे किसी को मारता है?
भावार्थ
श्रीकृष्ण इस बोध को सीधे अर्जुन पर लागू करते हैं। यदि आत्मा मारी नहीं जा सकती, तो "स्वजनों का हत्यारा" बनने का अर्जुन का भय एक भ्रम पर टिका है। इससे हिंसा तुच्छ नहीं हो जाती — गीता कर्तव्य से और बिना द्वेष के कर्म करने पर बल देगी — पर यह अपराध-बोध के उस भाव को हटा देता है जो अर्जुन को जड़ बना रहा है।