यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
yaṁ sannyāsam iti prāhur yogaṁ taṁ viddhi pāṇḍava na hyasannyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaśhchana
हिंदी अर्थ
हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग जानो; क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं होता।
भावार्थ
यहाँ "संकल्प" का अर्थ है मन की स्वार्थ-केंद्रित योजना — "मुझे यह मिलेगा, मुझे वह चाहिए।" इसे छोड़ना ही संन्यास और योग दोनों का साझा हृदय है, इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि दोनों एक हैं।