श्रीभगवानुवाच । अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥
śhrī bhagavān uvācha anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ
हिंदी अर्थ
श्रीभगवान बोले: जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है; केवल अग्नि का त्याग करने वाला या केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है।
भावार्थ
छठा अध्याय तीसरे से पाँचवें अध्याय का सार देकर आरंभ होता है: सच्चा संन्यासी वह नहीं जिसने यज्ञ की अग्नि जलाना छोड़ दिया (निरग्निः) या काम करना छोड़ दिया (अक्रियः), बल्कि वह है जो परिणामों पर निर्भर हुए बिना कर्म करता है।