पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥
puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān kāraṇaṁ guṇa-saṅgo ’sya sad-asad-yoni-janmasu
हिंदी अर्थ
प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है, और इन गुणों का संग ही इसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।
भावार्थ
यह श्लोक एक पंक्ति में पुनर्जन्म की व्याख्या करता है: गुणों के प्रति "संग" (आसक्ति) आत्मा को आगे के जन्मों से बाँधता है। समस्या स्वयं प्रकृति नहीं, उससे चिपकना है। यह अध्याय 14 की भूमिका है, जो तीनों गुणों की विस्तार से जाँच करता है।
