क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati
हिंदी अर्थ
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शांति को प्राप्त होता है। हे कौन्तेय! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।
भावार्थ
"न मे भक्तः प्रणश्यति" — मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। श्रीकृष्ण अर्जुन से स्वयं इसकी घोषणा करने को कहते हैं (प्रतिजानीहि), मानो इसे एक सार्वजनिक आश्वासन बना रहे हों। यह गीता के सबसे प्रिय वचनों में से एक है।